Search This Blog

Wednesday, April 6, 2011

धर्म या मज़हब क्या है ? क्या धर्म हमारे लिए जरूरी है ?
‘धर्म’ किसी वर्ग-संप्रदाय अथवा मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजाघर, और ग्रंथों में बंधा हुआ कोई विधान नहीं है। किसी भी ग्रंथ या किसी भी पंथ में बंधा हुआ धर्म नहीं होता। धर्म का मतलब हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि से भी नहीं है। धर्म कोई पुराण, बाइबल, क़ुरान, गुरुग्रंथ साहब आदि नहीं होता।
‘धर्म या मज़हब’ संपूर्णता(Perfection) लिए हुये सत्य पर आधारित एक सर्वोच्च जीवन विधान है। हम सभी का जीवन विधान। किसी भी देश को सुव्यवस्थित(Systematic) तरीके से चलाने के लिए उस देश की सत्ता द्वारा एक संविधान बनाया जाता है और उस संविधान का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होता है, तथा संविधान का पालन न करने की स्थिति में व्यक्ति अपराधी माना जाता है। उसी प्रकार इस श्रष्टि को सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए उस सर्वोच्च सत्ता खुदा-गॉड-परमेश्वर ने जो विधान बनाया है, उसी को धर्म या मज़हब कहते हैं। इस संसार में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उस विधान (धर्म या मज़हब) का पालन करना अनिवार्य है अन्यथा वह अपराधी माना जाएगा। धर्म के अंतर्गत परमाणु से लेकर परमेश्वर तक की समस्त वास्तविक जानकारी (Perfect knowledge from Atom to Almighty) और इसके संचालन का विधान आता है। इस संपूर्ण जानकारी को निम्नलिखित भागों में बांटा गया है :
1 – संसार (World, या खिलकत) – ये संसार क्या है ?
2 – शरीर (जिस्म या Body) – ये शरीर क्या है ?
3 – जीव (रूह या Self) – इस शरीर को चलाने वाला ड्राईवर अर्थात जीव या रूह कौन
है?
4 – ईश्वर (Soul, Spirit, Devine light, आत्मा, ब्रह्म, नूर या चाँदना) – जीव को शरीर संचालन की क्षमता शक्ति (Power) प्रदान करने वाला ईश्वर क्या है ?
5 – परमेश्वर (खुदा, गॉड, अकालपुरुष, यहोवा, अल्लाहतला) – नूर को पैदा करने वाले, ईश्वरों के ईश्वर परमेश्वर की वास्तविक जानकारी।

उपर्युक्त विषयों की वास्तविक जानकारी ही वह विधान है जिसे धर्म कहा जाता है। जब तक इंसान इस सिस्टम को नहीं समझेगा, उसे कैसे पता चलेगा की उसे क्या करना है ?
वह कैसे जानेगा की – ये संसार क्या है ? मैं कौन हूँ ? मैं इस दुनिया में क्यों पैदा हुआ हूँ ? मेरा उद्देश्य क्या है ? मैं कहाँ से आया हूँ ? मरने के बाद कहाँ जाऊँगा ? न चाहते हुये भी इस इस दुनिया में हर किसी को एक दिन मरना पड़ता है। दुनिया की कोई ताकत उसे मरने से रोक नहीं सकती, आखिर किसने रचा है जनम मरण का ये खेल ?
कौन है इस अनंत श्रष्टि का रचियता ? हम जिस सिस्टम में रह रहे है उसे समझे बिना मनमाने तरीके से रहना शुरू कर देंगे तो परेशानी के सिवाय और क्या मिलेगा ?
जीव के उद्धार और जीवन के सुधार का विधान ही वास्तव में धर्म है। जिस प्रकार किसी भी देश में यदि एक ही सत्ता है तो अनेक संविधान नहीं हो सकते, उसी प्रकार खुदा-गॉड-भगवान-यहोवा-अकालपुरुष आदि आदि अनेक नाम वाला सर्वशक्तिमान परमेश्वर जब एक था, एक है और एक ही रहेगा तो फिर धर्म भी एक था, एक है और एक ही रहेगा । क्योंकि धर्म उस सर्वशक्तिमान द्वारा निर्धारित किया गया एक जीवन विधान है जो दोष रहित और सत्य पर आधारित है। सत्य क्या है ? सत्य केवल एकमात्र खुदा-गॉड-परमेश्वर है और कुछ भी नहीं है और परमेश्वर के निर्देशन में चलना ही धर्ममय होना कहलाता है। जब खुदा या अल्लाहतला एक है तो फिर मजहब अनेक कैसे हो सकते हैं ? ये हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि सब संप्रदाय या फ़िरके हैं, धर्म या मजहब नहीं। संप्रदाय, किसी विशेष मत को मानकर, उसके अनुसार जीवन जीने की एक शैली है जिसकी शुरुआत किसी सन्त-महात्मा या पैगम्बर द्वारा की गई होती है। जबकि धर्म, समस्त प्राणियों के लिए निर्धारित किया गया जीवन विधान है जिसकी शुरुआत स्वयं परमेश्वर द्वारा की गई है।
अतः आप सभी सुशिक्षित, विद्वान, बुद्धजीवी, पत्रकार, संपादक और राजनेता आदि सभी को ही इस सच्चाई को सहज ही स्वीकार करना चाहिए। जब इस्लाम का “ ला इलाह इल्ला हुव ” अर्थात एकमेव एक परमेश्वरवाद है ठीक वैसे ही ईसाई का “Only One GOD” एक परमपिता परमेश्वर (GOD Father) है, सिक्खों का “ एक ओंकार-सतसीरी अकाल है, सनातन हिंदुओं का “एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति” है, अर्थात सबकी मान्यता एकमेव “एक” ही है तो कोई भी व्यक्ति उस परमसत्य से निरपेक्ष कैसे हो सकता है? पूरी धरती पर कोई भी यह बतला दे कि किसे सत्य की अपेक्षा नहीं है ? कोई भी धर्म का जानकार ये बतला दे कि क्या परमसत्य से हटकर धर्म कोई चीज है ? नही ! अर्थात सत्य ही धर्म है।
धर्म निरपेक्ष होने का मतलब है सत्य निरपेक्ष हो जाना या मतिभ्रष्ट हो जाना और नाना प्रकार के आडंबरी, ढोंगी, पाखंडी, धूर्तबाज़ आदि सभी को अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए जन समुदाय के धन और धर्म-भाव का शोषण करने कि छूट देना, यह कहते हुये कि हमारा संविधान धर्म निरपेक्ष है इसलिए हर किसी को अपना मत लेकर चलने का अधिकार है।
जब सत्य एक है तब धर्म भी एक है, और जब सत्य-धर्म एक ही है तो पूर्ण और सत्य मत भी एक ही होगा। शेष तो सभी अपूर्ण और असत्य ही होंगे । उन अपूर्ण और असत्य वालों का संरक्षण कैसा ?

No comments:

Post a Comment