तस्मादित्यादिकं कर्म लोकरन्जन कारकम् ।
मोक्षस्य कारणं साक्षात् तत्त्वज्ञानं खगेश्वर ॥
(गरुड़ पुराण 16/70)
हे पक्षिराज गरुड़ ! सम्पूर्ण कर्म (जप, तप, व्रत, नियम, तीर्थ, स्नान, दान, उपवास, त्याग आदि) तो लोक को प्रसन्न करने वाले हैं, मोक्ष का कारण तो साक्षात् तत्त्वज्ञान ही है।
षड दर्शन महाकूपे पतिताः पशवः खग ।
परमार्थ न जानन्ति पशुपाश नियंत्रिताः ॥
(गरुड़ पुराण 16/71)
हे गरुड़ ! छः दर्शन रूपी बड़े भारी कुवें में गिरे हुये पशु पुरुष परमार्थ तत्त्व को नहीं जान सकते, क्योंकि वे पशु पाशों में बंधे हुये हैं।
वेद शास्त्रार्णवे घोरे उह्मान्माना इतस्ततः ।
षडूर्मिनिग्रह ग्रस्तास्तिष्ठन्ति हि कुतार्किकाः ॥
(गरुड़ पुराण 16/72)
वेद, शास्त्र रूप बड़े भारी अथाह समुद्र में पड़े हुये ग्रन्थान्तरों के पढ़ने से इधर-उधर भटकने वाले तथा वुभुक्षा, पिपासा, शोक, मोह, जन्म और मृत्यु इन छः उर्मियों से ग्रसे हुये कुतर्क के कारण केवल कुतर्क ही करते रहते हैं।
वेदागम पुराणज्ञः परमार्थम् न वेत्ति यः ।
विडंबकस्य तस्यैव तत्सर्वं काकभाषितम् ॥
(गरुड़ पुराण 16/73)
वेद, पुराणों को जानता हुआ भी जो पुरुष परमार्थ तत्त्व को नहीं जानता, ऐसे उस विडम्बक का पढ़ना और बोलना सब कुछ कौवे की तरह केवल टाँय-टाँय ही है।
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयमिति चिन्ता समाकुलाः ।
पठन्त्यहर्निशं शास्त्र परमतत्त्वम् पराङ्मुखाः ॥
(गरुड़ पुराण 16/74)
यह ज्ञान है, यह ज्ञेय (जानने योग्य) है, इस चिन्ता में व्याकुल कुछ लोग रात दिन शास्त्र के पढ़ने में लगे रहते हैं, परन्तु फिर भी परमतत्त्वम् को नहीं जान पाते।
पठन्ति वेद शास्त्राणि बोधयंति परस्परम् ।
न जानन्ति परमतत्त्वम् दर्वीपाकरसं यथा ॥
(गरुड़ पुराण 16/78)
वे वेद और शास्त्रों को पढ़ते रहते हैं तथा आपस में समझते- समझाते भी रहते हैं, किन्तु इतने पर भी वे परमत्त्वम् को नहीं जान पाते हैं जैसे करछुली (चमचा) सब्जी-दाल में रहते हुये भी उसके स्वाद को नहीं जान सकती है।
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढाः शास्त्रेषु मूह्यति ।
गोपः कुक्षिगते छागे कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥
(गरुड़ पुराण 16/80)
मूर्ख मनुष्य आत्मतत्त्वम् को न जानकर शास्त्रों के वाक्यों में मोहित होता रहता है जिस प्रकार कि बगल में लिए हुये बकरे को बगल में लिए हुये न जानकर भूल से मूर्ख ग्वारिया कुआँ में खोजता रहता है।
न वेदाध्ययनान्मुक्तिर्न शास्त्र पठनादपि ।
ज्ञानादेवहि कैवल्यं नान्यथा विनतात्मज ॥
(गरुड़ पुराण 16/87)
मुक्ति न तो वेदों के अध्ययन से होती है और न तो शास्त्रों के पढ़ने से ही। मुक्ति तो हे गरुड़ केवल तत्त्वज्ञान से प्राप्त होती है।
नाश्रमः कारणं मुक्तेदर्शनानि न करणम् ।
तथैव सर्वकर्माणि ज्ञानमेवहि कारणम् ॥
(गरुड़ पुराण 16/88)
मुक्ति का कारण न तो आश्रम है, न दर्शन शास्त्र ही है और न तो सम्पूर्ण कर्म ही हैं। मुक्ति का कारण तो केवल एकमात्र तत्त्वज्ञान ही है।
अद्वैत हि शिवं प्रोक्तं क्रियायास विविर्जितम् ।
गुरुवक्त्रेण लभ्येत नाधीतागम कोटिभिः ॥
(गरुड़ पुराण 16/90)
परमब्रह्म कल्याण रूप अद्वैत है। वह कर्मकाण्ड, योग-साधना, मुद्राओं आदि क्रियाओं के परिश्रम से नहीं प्राप्त होता है और न करोड़ों शास्त्रों के पढ़ने से ही मिलता है, केवल गुरु के सदुपदेश से ही मिलता है।
मोक्षस्य कारणं साक्षात् तत्त्वज्ञानं खगेश्वर ॥
(गरुड़ पुराण 16/70)
हे पक्षिराज गरुड़ ! सम्पूर्ण कर्म (जप, तप, व्रत, नियम, तीर्थ, स्नान, दान, उपवास, त्याग आदि) तो लोक को प्रसन्न करने वाले हैं, मोक्ष का कारण तो साक्षात् तत्त्वज्ञान ही है।
षड दर्शन महाकूपे पतिताः पशवः खग ।
परमार्थ न जानन्ति पशुपाश नियंत्रिताः ॥
(गरुड़ पुराण 16/71)
हे गरुड़ ! छः दर्शन रूपी बड़े भारी कुवें में गिरे हुये पशु पुरुष परमार्थ तत्त्व को नहीं जान सकते, क्योंकि वे पशु पाशों में बंधे हुये हैं।
वेद शास्त्रार्णवे घोरे उह्मान्माना इतस्ततः ।
षडूर्मिनिग्रह ग्रस्तास्तिष्ठन्ति हि कुतार्किकाः ॥
(गरुड़ पुराण 16/72)
वेद, शास्त्र रूप बड़े भारी अथाह समुद्र में पड़े हुये ग्रन्थान्तरों के पढ़ने से इधर-उधर भटकने वाले तथा वुभुक्षा, पिपासा, शोक, मोह, जन्म और मृत्यु इन छः उर्मियों से ग्रसे हुये कुतर्क के कारण केवल कुतर्क ही करते रहते हैं।
वेदागम पुराणज्ञः परमार्थम् न वेत्ति यः ।
विडंबकस्य तस्यैव तत्सर्वं काकभाषितम् ॥
(गरुड़ पुराण 16/73)
वेद, पुराणों को जानता हुआ भी जो पुरुष परमार्थ तत्त्व को नहीं जानता, ऐसे उस विडम्बक का पढ़ना और बोलना सब कुछ कौवे की तरह केवल टाँय-टाँय ही है।
इदं ज्ञानमिदं ज्ञेयमिति चिन्ता समाकुलाः ।
पठन्त्यहर्निशं शास्त्र परमतत्त्वम् पराङ्मुखाः ॥
(गरुड़ पुराण 16/74)
यह ज्ञान है, यह ज्ञेय (जानने योग्य) है, इस चिन्ता में व्याकुल कुछ लोग रात दिन शास्त्र के पढ़ने में लगे रहते हैं, परन्तु फिर भी परमतत्त्वम् को नहीं जान पाते।
पठन्ति वेद शास्त्राणि बोधयंति परस्परम् ।
न जानन्ति परमतत्त्वम् दर्वीपाकरसं यथा ॥
(गरुड़ पुराण 16/78)
वे वेद और शास्त्रों को पढ़ते रहते हैं तथा आपस में समझते- समझाते भी रहते हैं, किन्तु इतने पर भी वे परमत्त्वम् को नहीं जान पाते हैं जैसे करछुली (चमचा) सब्जी-दाल में रहते हुये भी उसके स्वाद को नहीं जान सकती है।
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्वा मूढाः शास्त्रेषु मूह्यति ।
गोपः कुक्षिगते छागे कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥
(गरुड़ पुराण 16/80)
मूर्ख मनुष्य आत्मतत्त्वम् को न जानकर शास्त्रों के वाक्यों में मोहित होता रहता है जिस प्रकार कि बगल में लिए हुये बकरे को बगल में लिए हुये न जानकर भूल से मूर्ख ग्वारिया कुआँ में खोजता रहता है।
न वेदाध्ययनान्मुक्तिर्न शास्त्र पठनादपि ।
ज्ञानादेवहि कैवल्यं नान्यथा विनतात्मज ॥
(गरुड़ पुराण 16/87)
मुक्ति न तो वेदों के अध्ययन से होती है और न तो शास्त्रों के पढ़ने से ही। मुक्ति तो हे गरुड़ केवल तत्त्वज्ञान से प्राप्त होती है।
नाश्रमः कारणं मुक्तेदर्शनानि न करणम् ।
तथैव सर्वकर्माणि ज्ञानमेवहि कारणम् ॥
(गरुड़ पुराण 16/88)
मुक्ति का कारण न तो आश्रम है, न दर्शन शास्त्र ही है और न तो सम्पूर्ण कर्म ही हैं। मुक्ति का कारण तो केवल एकमात्र तत्त्वज्ञान ही है।
अद्वैत हि शिवं प्रोक्तं क्रियायास विविर्जितम् ।
गुरुवक्त्रेण लभ्येत नाधीतागम कोटिभिः ॥
(गरुड़ पुराण 16/90)
परमब्रह्म कल्याण रूप अद्वैत है। वह कर्मकाण्ड, योग-साधना, मुद्राओं आदि क्रियाओं के परिश्रम से नहीं प्राप्त होता है और न करोड़ों शास्त्रों के पढ़ने से ही मिलता है, केवल गुरु के सदुपदेश से ही मिलता है।
No comments:
Post a Comment