क्यों जरूरी है स्वयं को जानना ?
अगर आप एक छोटी सी मशीन भी खरीद कर लाते हैं तो उसके साथ में आपको एक बुकलेट मिलती है जिसमें उस मशीन को चलाने और उसके रख रखाव का तरीका लिखा होता है। अगर आप अनपढ़ हैं और बुकलेट नहीं पढ़ सकते तो किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं जो उस मशीन का जानकार होता है, और उससे पूछते हैं कि भैया यह मशीन किस तरह चलती है, और इसका रख-रखाव किस प्रकार किया जाता है। इस प्रकार मशीन को ठीक प्रकार से चलाने के लिए आप उस मशीन के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त करते हैं। जब तक मशीन के बारे में जानकारी नहीं होगी तब तक आपको यह कैसे पता चलेगा कि वह मशीन क्या है और क्यों है ?
यह मानव इस धरती की सर्वोत्तम मशीन है, जिसने अनेकों मशीनों का निर्माण किया है।
तो क्या यह जानना जरूरी नहीं है कि यह मानव क्या है और क्यों है ? क्या कभी मानव का बुकलेट खोलकर देखने की कोशिश की ? ये जितने भी सद्ग्रंथ हैं, ये सब मानव रूपी मशीन की बुकलेट ही तो हैं। क्या कभी इन्हे पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं की ? तो फिर कैसे पता चलेगा कि मानव क्या है और इसका कर्तव्य क्या है ? बिना जाने ही मशीन को आपरेट करने में लगे हुये हो ! मानव शरीर प्राप्त कर ली लेकिन मानव को ही नहीं जानते ! फिर आप किस कर्तव्य के पालन की बात करते हो जब आपको पता ही नहीं है कि मानव का कर्तव्य क्या है ? चार अक्षर पढ़ लिए, बी०ए०, एम०ए० कर लिए, एम०बी०बी०एस० कर लिए डॉक्टर बन गए, इंजीनियर बन गए और ऐंठ कर बोलने लगे। चार अक्षर क्या पढ़ लिए कि अब इनको रटने लगा कर्तव्य और दायित्व। क्या ? भाई-बाप की परवरिश कर्तव्य है, बेटा बेटी की परवरिश कर्तव्य है, घर चलना कर्तव्य है। पता नहीं इन मूर्खों को कर्तव्य की परिभाषा किसने बता दी। जानने को तो इन्हे अपने अस्तित्व का ही पता नहीं नहीं है, और बात करते हैं कर्तव्य की। अरे जब पता ही नहीं है कि हम कौन हैं तो फिर कैसे पता चलेगा कि हमारा कर्तव्य क्या है? जब पता ही नहीं कि हम शरीर हैं कि जीव हैं, आत्मा हैं कि परमात्मा हैं, तो फिर कर्तव्य कैसे पता चलेगा ? मनुष्य माने क्या होता है ? मनुष्य माने भोगी व्यसनी जीव नहीं। मनुष्य माने विवेकशील प्राणी। आपको पता है कि विवेक किसे कहते हैं ? विवेक उस विधान का नाम है जिसके द्वारा परमात्मा की जानकारी होती है। भगवान ने जो विवेक दिया था उसको तो अपने कूड़ेदान में डाल दिया और फिर भी अपने आप को मनुष्य कह रहे हैं ! विवेक रहित भी कहीं मनुष्य होता है ? यदि आप अपने आप को मनुष्य कहलाना चाहते हैं तो जीवन में विवेक को आगे लाना होगा, बुद्धि मात्र को नहीं। बुद्धि तो सांसारिक कार्यों के लिए होती है। यदि हमें पारलौकिक जानकारी प्राप्त करनी है, ईश्वर और परमेश्वर से संबंधित जानकारी प्राप्त करनी है तो विवेक का प्रयोग करना होगा। जब तक किसी विषय-वस्तु के अस्तित्व को नहीं जानेंगे तब तक यह पता नहीं चलेगा कि वह विषय-वस्तु क्या है ? और किसलिए है ? जब तक इन दोनों सवालों के जबाब नहीं मिल जाते तब तक उस विषय-वस्तु का सदुपयोग कैसे हो सकता है ?
किसी भी कर्तव्य का निर्धारण अस्तित्व और पोजीशन से होता है। जब तक आस्तित्व और पोजीशन का पता नहीं चलेगा तब तक कर्तव्य जन्म ही नहीं लेगा। इसके लिए हमें विवेक की शरण में जाना होगा। विवेक ही एकमात्र वह पद्वति है जिसमें हमारे आपके जीवन के आस्तित्व का सूत्र है, परिभाषा है, व्याख्या है, प्रयोग है। अगर आप विवेकशील नहीं बने तो निःसंदेह आप मनुष्य की परिभाषा में नहीं आ सकते। बुद्धि तो आपकी दौड़ती है लेकिन विवेक जरूरी है। आजकल के वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर रहे हैं कि बुद्धि में तो कुछ जन्तु भी मनुष्य से आगे हैं लेकिन उनके साथ विवेक नहीं है।
विवेक परमेश्वर ने केवल मनुष्य को ही दिया था जिसका बन्द पैकेट आप लोगो ने खोला ही नहीं। खा चबा गए अपने जीवन को। जीवन में विवेक की पोटली खोली ही नहीं तो मनुष्य का अर्थ, मनुष्य का अस्तित्व, मनुष्य जीवन की पोजीशन, मनुष्य का कर्तव्य और दायित्व कैसे पता चलेगा ? सपोज कीजिये कोई जिला मुख्यालय का आफिस है उसमें चारों श्रेणियों की पोस्ट है जिसमें चपरासी की भी है गेट पर, क्लर्क महोदय की भी है काउंटर पर, साहब की भी है चेयर पर और क्लास वन के अफसर का भी केविन है। अब आपकी नौकरी लग गई और आप पहली बार उस आफिस में जाते हैं। अब आपको अगर अपनी पोजीशन नहीं पता है कि आप क्लास वन वाले हैं कि टू वाले, थ्री वाले हैं कि फोर वाले तो आप आफिस में किस कुर्सी पर बैठेंगे ? आपको किसे पता चलेगा कि आपका दायित्व और कर्तव्य क्या है ? अगर क्लास फोर का एक चपरासी जज की कुर्सी पर बैठकर फाइल खोलने लगे तो क्या होगा ? अरे वह अपराधी हो जाएगा और गिरफ्तार कर लिया जाएगा। पहले जो कास्ट(जाति) सिस्टम था वही आज क्लास सिस्टम हो गया है। पहले जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कास्ट थी वही आज क्लास वन, क्लास टू, क्लास थ्री और क्लास फोर है। कोई अन्तर नहीं है। जो ड्यूटि उस समय ब्राह्मण की थी वही आज क्लास वन की है, जो ड्यूटि क्षत्रिय की थी वही आज क्लास टू की है, जो ड्यूटि वैश्य की थी वही आज क्लास थ्री की है और जो ड्यूटि शूद्र की थी वही आज क्लास फोर की है।
संविधान धर्म-निरपेक्ष। धर्म-निरपेक्ष माने क्या ? क्या धर्म कोई तिलक चन्दन है ? क्या धर्म दाड़ी, केश, जटा जूट है ? क्या धर्म कोई मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा है ? धर्म कोई पोथी पुराण का नाम है क्या ? धर्म न कोई मंत्र है, न कोई तंत्र है, न कोई पंथ है और न कोई मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा है। धर्म हमारे जीवन का एक सच्चा सर्वोत्तम विधान है जिसमें चार चरण हैं- दोष रहित, सत्य प्रधान, उन्मुक्त और अमर जीवन पद्वति। दोष रहित- यानि हमारे में जो भी दोष-दुर्गुण हों उन्हे निकाल फेंके। सत्य की प्रधानता- यानि हर स्तर पर, हर क्रिया-कर्म में अपने आप को सत्य से जोड़ें। उन्मुक्तता और अमरता – भोग-माया-मृत्यु ये सब त्याज्य हैं, ठीक इसके विपरीत सत्य, धर्म, ज्ञान, अमरत्व, मोक्ष ये सब ग्राहय हैं। ग्राहय को ग्राहय और त्याज्य को त्याज्य के रूप में आप व्यवहार करो, प्रयोग करो, उपभोग करो तब आप सही दिशा को प्राप्त करोगे। अपनी मंज़िल को प्राप्त करोगे। हमारा कर्तव्य तो यह था कि त्याज्य को जाने, समझें, परखें और हर क्षण त्याज्य भाव में उसके साथ रहें लेकिन उसको पास न आने दें। इसी प्रकार जो ग्राहय है उसको भी जाने, देखें, समझें, परखें। त्याज्य यानि असत्य के साथ त्याज्य भाव रखें और ग्राहय यानि सत्य के साथ ग्राहय भाव रखें यही हम सब का कर्तव्य और दायित्व है।
अगर आप एक छोटी सी मशीन भी खरीद कर लाते हैं तो उसके साथ में आपको एक बुकलेट मिलती है जिसमें उस मशीन को चलाने और उसके रख रखाव का तरीका लिखा होता है। अगर आप अनपढ़ हैं और बुकलेट नहीं पढ़ सकते तो किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाते हैं जो उस मशीन का जानकार होता है, और उससे पूछते हैं कि भैया यह मशीन किस तरह चलती है, और इसका रख-रखाव किस प्रकार किया जाता है। इस प्रकार मशीन को ठीक प्रकार से चलाने के लिए आप उस मशीन के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त करते हैं। जब तक मशीन के बारे में जानकारी नहीं होगी तब तक आपको यह कैसे पता चलेगा कि वह मशीन क्या है और क्यों है ?
यह मानव इस धरती की सर्वोत्तम मशीन है, जिसने अनेकों मशीनों का निर्माण किया है।
तो क्या यह जानना जरूरी नहीं है कि यह मानव क्या है और क्यों है ? क्या कभी मानव का बुकलेट खोलकर देखने की कोशिश की ? ये जितने भी सद्ग्रंथ हैं, ये सब मानव रूपी मशीन की बुकलेट ही तो हैं। क्या कभी इन्हे पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं की ? तो फिर कैसे पता चलेगा कि मानव क्या है और इसका कर्तव्य क्या है ? बिना जाने ही मशीन को आपरेट करने में लगे हुये हो ! मानव शरीर प्राप्त कर ली लेकिन मानव को ही नहीं जानते ! फिर आप किस कर्तव्य के पालन की बात करते हो जब आपको पता ही नहीं है कि मानव का कर्तव्य क्या है ? चार अक्षर पढ़ लिए, बी०ए०, एम०ए० कर लिए, एम०बी०बी०एस० कर लिए डॉक्टर बन गए, इंजीनियर बन गए और ऐंठ कर बोलने लगे। चार अक्षर क्या पढ़ लिए कि अब इनको रटने लगा कर्तव्य और दायित्व। क्या ? भाई-बाप की परवरिश कर्तव्य है, बेटा बेटी की परवरिश कर्तव्य है, घर चलना कर्तव्य है। पता नहीं इन मूर्खों को कर्तव्य की परिभाषा किसने बता दी। जानने को तो इन्हे अपने अस्तित्व का ही पता नहीं नहीं है, और बात करते हैं कर्तव्य की। अरे जब पता ही नहीं है कि हम कौन हैं तो फिर कैसे पता चलेगा कि हमारा कर्तव्य क्या है? जब पता ही नहीं कि हम शरीर हैं कि जीव हैं, आत्मा हैं कि परमात्मा हैं, तो फिर कर्तव्य कैसे पता चलेगा ? मनुष्य माने क्या होता है ? मनुष्य माने भोगी व्यसनी जीव नहीं। मनुष्य माने विवेकशील प्राणी। आपको पता है कि विवेक किसे कहते हैं ? विवेक उस विधान का नाम है जिसके द्वारा परमात्मा की जानकारी होती है। भगवान ने जो विवेक दिया था उसको तो अपने कूड़ेदान में डाल दिया और फिर भी अपने आप को मनुष्य कह रहे हैं ! विवेक रहित भी कहीं मनुष्य होता है ? यदि आप अपने आप को मनुष्य कहलाना चाहते हैं तो जीवन में विवेक को आगे लाना होगा, बुद्धि मात्र को नहीं। बुद्धि तो सांसारिक कार्यों के लिए होती है। यदि हमें पारलौकिक जानकारी प्राप्त करनी है, ईश्वर और परमेश्वर से संबंधित जानकारी प्राप्त करनी है तो विवेक का प्रयोग करना होगा। जब तक किसी विषय-वस्तु के अस्तित्व को नहीं जानेंगे तब तक यह पता नहीं चलेगा कि वह विषय-वस्तु क्या है ? और किसलिए है ? जब तक इन दोनों सवालों के जबाब नहीं मिल जाते तब तक उस विषय-वस्तु का सदुपयोग कैसे हो सकता है ?
किसी भी कर्तव्य का निर्धारण अस्तित्व और पोजीशन से होता है। जब तक आस्तित्व और पोजीशन का पता नहीं चलेगा तब तक कर्तव्य जन्म ही नहीं लेगा। इसके लिए हमें विवेक की शरण में जाना होगा। विवेक ही एकमात्र वह पद्वति है जिसमें हमारे आपके जीवन के आस्तित्व का सूत्र है, परिभाषा है, व्याख्या है, प्रयोग है। अगर आप विवेकशील नहीं बने तो निःसंदेह आप मनुष्य की परिभाषा में नहीं आ सकते। बुद्धि तो आपकी दौड़ती है लेकिन विवेक जरूरी है। आजकल के वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर रहे हैं कि बुद्धि में तो कुछ जन्तु भी मनुष्य से आगे हैं लेकिन उनके साथ विवेक नहीं है।
विवेक परमेश्वर ने केवल मनुष्य को ही दिया था जिसका बन्द पैकेट आप लोगो ने खोला ही नहीं। खा चबा गए अपने जीवन को। जीवन में विवेक की पोटली खोली ही नहीं तो मनुष्य का अर्थ, मनुष्य का अस्तित्व, मनुष्य जीवन की पोजीशन, मनुष्य का कर्तव्य और दायित्व कैसे पता चलेगा ? सपोज कीजिये कोई जिला मुख्यालय का आफिस है उसमें चारों श्रेणियों की पोस्ट है जिसमें चपरासी की भी है गेट पर, क्लर्क महोदय की भी है काउंटर पर, साहब की भी है चेयर पर और क्लास वन के अफसर का भी केविन है। अब आपकी नौकरी लग गई और आप पहली बार उस आफिस में जाते हैं। अब आपको अगर अपनी पोजीशन नहीं पता है कि आप क्लास वन वाले हैं कि टू वाले, थ्री वाले हैं कि फोर वाले तो आप आफिस में किस कुर्सी पर बैठेंगे ? आपको किसे पता चलेगा कि आपका दायित्व और कर्तव्य क्या है ? अगर क्लास फोर का एक चपरासी जज की कुर्सी पर बैठकर फाइल खोलने लगे तो क्या होगा ? अरे वह अपराधी हो जाएगा और गिरफ्तार कर लिया जाएगा। पहले जो कास्ट(जाति) सिस्टम था वही आज क्लास सिस्टम हो गया है। पहले जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कास्ट थी वही आज क्लास वन, क्लास टू, क्लास थ्री और क्लास फोर है। कोई अन्तर नहीं है। जो ड्यूटि उस समय ब्राह्मण की थी वही आज क्लास वन की है, जो ड्यूटि क्षत्रिय की थी वही आज क्लास टू की है, जो ड्यूटि वैश्य की थी वही आज क्लास थ्री की है और जो ड्यूटि शूद्र की थी वही आज क्लास फोर की है।
संविधान धर्म-निरपेक्ष। धर्म-निरपेक्ष माने क्या ? क्या धर्म कोई तिलक चन्दन है ? क्या धर्म दाड़ी, केश, जटा जूट है ? क्या धर्म कोई मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा है ? धर्म कोई पोथी पुराण का नाम है क्या ? धर्म न कोई मंत्र है, न कोई तंत्र है, न कोई पंथ है और न कोई मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा है। धर्म हमारे जीवन का एक सच्चा सर्वोत्तम विधान है जिसमें चार चरण हैं- दोष रहित, सत्य प्रधान, उन्मुक्त और अमर जीवन पद्वति। दोष रहित- यानि हमारे में जो भी दोष-दुर्गुण हों उन्हे निकाल फेंके। सत्य की प्रधानता- यानि हर स्तर पर, हर क्रिया-कर्म में अपने आप को सत्य से जोड़ें। उन्मुक्तता और अमरता – भोग-माया-मृत्यु ये सब त्याज्य हैं, ठीक इसके विपरीत सत्य, धर्म, ज्ञान, अमरत्व, मोक्ष ये सब ग्राहय हैं। ग्राहय को ग्राहय और त्याज्य को त्याज्य के रूप में आप व्यवहार करो, प्रयोग करो, उपभोग करो तब आप सही दिशा को प्राप्त करोगे। अपनी मंज़िल को प्राप्त करोगे। हमारा कर्तव्य तो यह था कि त्याज्य को जाने, समझें, परखें और हर क्षण त्याज्य भाव में उसके साथ रहें लेकिन उसको पास न आने दें। इसी प्रकार जो ग्राहय है उसको भी जाने, देखें, समझें, परखें। त्याज्य यानि असत्य के साथ त्याज्य भाव रखें और ग्राहय यानि सत्य के साथ ग्राहय भाव रखें यही हम सब का कर्तव्य और दायित्व है।
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